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Saturday, October 24, 2015

!! दूसरों से अपनी तुलना मत करो !!

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एक बार की बात है किसी शहर में एक लड़का रहता था जो बहुत गरीब था। मेंहनत मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से 2 वक्त का खाना जुटा पाता । एक दिन वह किसी बड़ी कंपनी में चपरासी के लिए इंटरव्यू देने गया । मालिक ने उसे देखकर उसे काम दिलाने का भरोसा जताया । जब मालिक ने पूछा -”तुम्हारी email id क्या है”...??? लड़के ने मासूमियत से कहा कि उसके पास email id नहीं है । ये सुनकर मालिक ने उसे बड़ी घृणा दृष्टि से देखा और कहा कि आज दुनिया इतनी आगे निकल गयी है , और एक तुम हो कि email id तक नहीं है , मैं तुम्हें नौकरी पर नहीं रख सकता । ये सुनकर लड़के के आत्म सम्मान को बहुत ठेस पहुंची , उसकी जेब में उस समय 50 रुपये थे । उसने उन 50 रुपयों से 1 किलो सेब खरीद कर वह अपने घर चलता बना। वह घर घर जाकर उन सेबों को बेचने लगा और ऐसा करके उसने 80 रुपये जमा कर लिए । अब तो लड़का रोज सेब खरीदता और घर घर जाकर बेचता । सालों तक यही सिलसिला चलता रहा लड़के की कठिन मेहनत रंग लायी और एक दिन उसने खुद की कंपनी खोली जहाँ से विदेशों में सेब सप्लाई किये जाते थे । उसके बाद लड़के ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और जल्दी ही बहुत बड़े पैमाने पर अपना बिज़नेस फैला दिया और एक साधारण लड़का बन गया अरबपति... एक बार कुछ मीडिया वाले लड़के का इंटरव्यू लेने आये और अचानक किसी ने पूछ लिया – “सर आपकी email id क्या है”...???? लड़के ने कहा -”नहीं है “, ये सुनकर सारे लोग चौंकने लगे कि एक अरबपति आदमी के पास एक “email id” तक नहीं है । लड़के ने हंसकर जवाब दिया - ”मेरे पास email id नहीं है इसीलिए मैं अरबपति हूँ , अगर email id होती तो मैं आज एक चपरासी होता”...।
आप बहुत विशेष है और आपका जीवन बहुत मूल्यवान है। क्यों कि आप भगवान के बच्चे है।
इसीलिए कहा जाता है कि हर इंसान के अंदर कुछ ना कुछ खूबी जरूर होती है,
अपने टेलेंट और स्किल को पहचानो । दूसरों से अपनी तुलना मत करो (Do not compare yourself to others) कि उसके पास वो है मेरे पास नहीं है , जो कुछ तुम्हारे पास है उसी मे खुश रहो ।
दुसरो को देखेंगे तो दुख के सिवाय कुछ नही हासिल होगा ।।
दुआऐ दो और दुआऐ लो ।।

Saturday, July 18, 2015

सेवा, सिमरन और सत्संग करने के बाद भी अगर जीवन में बदलाव नहीं आया तो क्या कारण है ?

सेवा, सिमरन और सत्संग करने के बावजूद भी अगर जीवन में बदलाव नहीं आया .....! तो क्या कारण है ?

सेवा, सिमरन और सत्संग करने के बावजूद भी अगर जीवन में सुख नहीं आया .....! तो क्या कारण है ? दूसरों की निंदा, बुराई, ईर्ष्या, द्वेष, गाली-गलोच, लालच जीवन में अभी भी हैं तो कारण क्या है ?? इसका मतलब जैसे हुजूर बाबा जी कहते हैं ...कि एक चलना भी वो है जिसके कारण मंजिल पर पहुँचते हैं और एक चलना कोल्हू के बैल का भी जो चलता तो है पर कहीं पहुँचता ही नहीं है । कहीं ऐसा तो नहीं है कि मेरी सेवा, सिमरन और सत्संग कोल्हू के बैल की तरहा हो रही है जिसके कारण मेरे जीवन सुख नहीं है , जीवन में बदलाव है ......! अगर ऐसा ही है तो क्यों है ??? कारण एक ही है अभी पूर्ण समर्पण नहीं हुआ । अर्थात जीवन में समर्पण की कमी है .....! अर्थात् मैने अपने आप को गुरू के चरणों में समर्पित ही नहीं किया । और जिस दिन पूर्ण समर्पण हो जाएगा उस दिन से ही जीवन में सुख आने लगेंगे, उस दिन से ही जीवन में सही बदलाव आने लगेगा

Saturday, July 11, 2015

बाबा सावन सिंह जी के समय की बात है

बाबा सावन सिंह जी के समय की बात है| एक बार बाबा जी के खेतो में कोई चरवाहा अपनी भेडो को लेकर आ गया | वे भेडे जिधर जिधर से गई वहा की सारी चने की फसल खा गई| बाबा जी ने जिसे खेत समभालने की जिममेवारी दी हुई थी वह बाबा जी के पास आया और बोला के बाबा जी आप उस चरवाहे को सजा दो जि सने अपनी भेडो से यह काम करवाया है| बाबा जी पहले तो कुछ नही बोले फिर उनहोने अपनी बनदूक उठाई और खेत की तरफ चले गए फिर उनहोने खेत के तीन चककर लगाए और बनदूक को आसमान की तरफ करके तीन बार फायर किया पास में खडे सेवादार ने पूछा के बाबा जी आपने उस चरवाहे को तो कुछ नही कहा और ये फायर कयू किया तो बाबा जी ने कहा कि मैने ये फायर धरमराज को यह बताने के लिए किया है कि अब ये सारी भेडे मेरी हो गई
देखो मालिक ने जिसे बकशना है कैसे भी बकश लेता है
शायद हम भी उन भेडो मे से एक है
राधा सवामी जी

डेरे के बुजुर्ग और ‎सत्संगी‬ बताते है कि...

डेरे के बुजुर्ग और उच्च कोटि के ‪#‎सत्संगी‬ बताते है कि ‪#‎हुजूरJI‬ की सबको अपनी ओर खीचने की शक्ति का रहस्य तभी खुलता जब कोई अंदर जाता है , और उनके पीछे पीछे उंचे मंडलो मे पहुचता है ! तब यह रहस्य अच्छी तरह उसकी समझ मे आ जाता है ! ‪#‎महाराज‬ JI ‪#‎रूप‬ मे देखने वाला व्यक्ति उसकी वास्तविक महानता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता ! पर यदी अंदर जाकर उसके साथ उनके साथ उपर के ‪#‎मंडलो‬ का सफर करे तभी , और केवल तभी उनके ‪#‎वास्तविक‬ #रूप का ‪#‎ज्ञान‬ होता है ! अभ्यासी कहते है की उन मंडलो मे अपने ही प्रकाश से चमक रही लाखो रूहे अक्सर #हुजूरJI के पीछे पीछे चलती और बड़े प्यार तथा आदर भाव से उनके ‪#‎चरन्‬ ‪#‎कमलो‬ मे ‪#‎प्रणाम‬ करती दिखाई देती है !
जी को केवल एक मनुष्य के

Satsang Me Baar Baar jaayen.

एक बार एक आदमी सन्तों के पास गया और बोला की महाराज मैं एक -दो बार सत्संग में गया था पर कोई खास बात समझ नहीं आई...

तब सन्तों ने उससे एक सवाल किया. के नल की टोंटी को अगर पूरा खोल दोगे तो तुम उससे पूरा गिलास पानी भर पाओगे. ?

वह आदमी बोला नहीं.

तब सन्त बोले क्यों. ?

वह बोला पानी प्रैशर से आयेगा तो गिलास कभी पूरा नहीं भरेगा.. लेकिन टोंटी को धीरे कर दिया जाये तो धीरे-धीरे वह गिलास भर जायेगा.
तब सन्त बोले यही बात मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ.
की एक-दो बार सत्संग मैं जाने से संसकार नहीं आते बल्कि बार-बार सत्संग में जाने से सन्तो से मिलने से धीरे-धीरे मनुष्य को भक्ति की समझ आती ओर जब उसे भक्ति की समझ आ जाती है तो वह भवसागर से पार हो जाता है..

Thursday, July 21, 2011

अमीरी-गरीबी का फर्क

शमशान घाट पर दो अलग-अलग समूहों में कुछ लोग मृत शरीर लेकर आए एक समूह किसी बहुत अमीर आदमी के शव को सम्मान और बाजे -गाजे के साथ लाये थे और दूसरा वाला कोई गरीब था जिसे कुछ लोगो ने जैसे-तैसे उसे शमशान तक पंहुचा दिया. दोनों अग्नि को समर्पित हो गए . जब चिताएं ठंडी हो गईं तो लोग वहां से चले गए.
वहां एक फकीर भी श्मशान में बैठा था तब वह फकीर उठा और अपने हाथों में दोनों चिताओं की राख लेकर बारी-बारी से उन्हें सूंघने लगा. लोगों ने आश्चर्य से उसके इस कृत्य को देखा और उसे पागल समझा.
एक व्यक्ति से रहा नहीं गया.वह फकीर के निकट गया और उससे पूछा- बाबा! ये चिता की राख मुट्ठियों में भरकर और इसे सूंघकर क्या पता लगा रहे हो?

उस फकीर ने कहा- मैं गहरी छानबीन में हूँ ,उसने दाहिने हाथ की मुट्ठी खोलकर उसकी राख को दिखाते हुए बोला- यह एक अमीर व्यक्ति की राख है जिसने जीवनभर बड़े सुख भोगे, दूध-घी, मेवे-मिष्ठान्न खाए है ,और दूसरी मुट्ठी की राख दिखाते हुए फकीर ने कहा- यह एक ऐसे गरीब आदमी की राख है जो आजीवन कठोर परिश्रम करके भी रूखी-सूखी ही खा पाया. मैं इस छानबीन में हूं कि अमीर व गरीब में बुनियादी फर्क क्या है, पर मुझे तो दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा मुझे तो दोनों ही सिर्फ राख नजर आ रहे है .तब फकीर ने कहा -"लाखों मुफलिस हो गए, लाखों तवंगर हो गए. खाक में जब मिल गए, दोनों बराबर हो गए."

अमीरी-गरीबी का फर्क इंसानियत को हमसे दूर ले जाती है, इस फर्क को एक-न-एक दिन मिट ही जाना है तो क्यों न आज से ही सबको बराबर समझे.

बुराइयों से मुक्ति

एक डाकू रोज डाका डालता, किंतु धीरे-धीरे वह अपने इस जीवन से परेशान हो गया. वह एक दिन गुरुनानक के पास गया और उनके चरणों में गिरकर बोला- महाराज! मैं अपने जीवन से तंग आ गया हूं, जाने कितनों को मैंने लूटकर दुखी किया है। आप ही मुझे कोई मार्ग बताइए, जिससे मैं इस बुराई से बच सकूं.

नानक ने स्नेहपूर्वक उसके सिर पर हाथ फेरा और बोले- इसमें कौन सी बड़ी बात है? तुम बुराई करना छोड़ दो तो उससे बच जाओगे.

डाकू ने उनकी बात सुनी और कहा- अच्छी बात है. मैं कोशिश करूंगा। थोड़े दिन बाद वह पुन: लौटकर गुरुनानक के पास आया और बोला- गुरुजी! मैंने बुराई को छोड़ने का बहुत प्रयास किया, किंतु नहीं छोड़ पाया. मैं अपनी आदत से लाचार हूं .मुझे और कोई उपाय बताएं.

नानक ने कहा- ऐसा करो कि तुम्हारे मन में जो भी बात उठे, उसे कर डालो, किंतु रोज के रोज उसे दूसरे लोगों से कह दो.
डाकू बहुत प्रसन्न हुआ कि अब वह बेधड़क डाका डालेगा और दूसरों से कहकर मन हल्का कर लेगा.

कुछ दिन बीतने पर वह फिर गुरुनानक के पास पहुंचा और बोला- गुरुजी! बुरा काम करना जितना मुश्किल है, उससे कहीं अधिक मुश्किल है दूसरों के सामने अपनी बुराइयों को कहना. इसलिए दोनों में से मैंने आसान रास्ता चुना है. डाका डालना ही छोड़ दिया है.

बुराइयों को स्वीकार करने से बेहतर उनका त्याग है, क्योंकि स्वीकार से मन हल्का तो होता है, किंतु अपराधी भाव से पूर्णत: मुक्ति नहीं मिल पाती और यह मुक्ति त्याग में ही निहित है.

Monday, July 18, 2011

स्वयं का सही मूल्यांकन

एक बार स्वामी विवेकानन्द रेल में यात्रा कर रहे थे. एक भिखारी ने अपनी गरीबी का हवाला देते हुए उनसे भीख मांगी. पहले स्वामीजी ने कुछ जबाब नहीं दिया , फिर दूसरी बार भिखारी ने कहा, ‘‘श्रीमान्, मैं बहुत गरीब हूं, मेरे पास कुछ भी नहीं है, मुझ पर दया करो.’’ 

उसके दुबारा भीख मांगने पर स्वामी जी के  आंखों से आंसू टपकने लगे. तपाक से सहयात्री ने पूछा, ‘‘श्रीमान्, क्या बात है ?’’

विवकेकानन्द ने कहा, ‘‘इस अमीर आदमी द्वारा दयनीय जीवन जीने एवं भीख मांगने के कारण मुझे कष्ट हुआ.’’

इस पर सहयात्री ने कहा, ‘‘अरे, यह तो भिखमंगा है. आप इसे अमीर कैसे कह रहे हैं ?’’


तब स्वामीजी ने भिखारी से पूछा, ‘‘क्या आप मुझे अपना बांया हाथ एक लाख रुपयों में बेचोगे ? मैं खरीदना चाहता हूं, रुपये अभी दूंगा.’’ भिखारी ने मना कर दिया. 
‘‘क्या दांया हाथ एक लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं!’’‘‘क्या बांया पांव एक लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं!’’‘‘दूसरा पांव दो लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं, यह बेचने के लिये नहीं है.’’
‘‘क्या एक आंख दो लाख में दोगे ?’’ यहां पर भी उत्तर नकारात्मक ही था.‘‘दूसरी आंख के पांच लाख दूंगा’’
 ‘‘नहीं, मैं इन्हें कैसे बेच सकता हूं?’’

इस पर स्वामीजी बोले, ‘‘बेच तो नहीं सकते, लेकिन इनका उपयोग भीख मांगने के लिये करते हो. इतना सब कुछ होते हुए भी क्या तुम अब भी गरीब हो ? क्या तुम्हारे पास कुछ नहीं है ?

जिसके पास इतना कीमती मानव शरीर है उसे आप क्या कहेंगे ?  भिखारी लज्जित होकर चला गया .

हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे पास बहुत कुछ है, पर हम हमेशा जो नहीं है उसी की चिन्ता में दुखी रहते हैं.जीवन में बाधाएं तो अक्सर आती हैं. परन्तु विजेता वही बनता है जो स्वयं का सही मूल्यांकन कर सकता हो.